सिडनी।
ऑस्ट्रेलिया में स्कूली बच्चों की राष्ट्रीय पहचान को लेकर सोच अब केवल कंगारू, बारबेक्यू या सॉसेज जैसे पारंपरिक प्रतीकों तक सीमित नहीं रह गई है। एक नए अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि बच्चे “ऑस्ट्रेलियाई होने” के अर्थ को गहरे सामाजिक, नैतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर देख रहे हैं।
अध्ययन में शामिल बच्चों ने समानता, निष्पक्षता, आपसी सम्मान, कानून का पालन और समुदाय के प्रति जिम्मेदारी को ऑस्ट्रेलियाई पहचान का केंद्रीय आधार बताया। बच्चों का मानना है कि एक सच्चा ऑस्ट्रेलियाई वही है जो दूसरों की परवाह करता है, विविधताओं का सम्मान करता है और समाज में एकता बनाए रखने में योगदान देता है।
शोध के दौरान यह भी सामने आया कि बच्चे ऑस्ट्रेलिया की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को उसकी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। विभिन्न नस्लों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोगों का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व बच्चों की नजर में देश की पहचान को मजबूत बनाता है। कई बच्चों ने कहा कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के बावजूद एक-दूसरे को स्वीकार करना ही ऑस्ट्रेलियाई होने का वास्तविक अर्थ है।
अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया कि बच्चों की सोच केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यवहारिक है। वे नागरिक जिम्मेदारियों, जैसे नियमों का पालन करना, दूसरों की मदद करना, पर्यावरण की रक्षा करना और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करना, को भी राष्ट्रीय पहचान से जोड़ते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह दृष्टिकोण बताता है कि आज की युवा पीढ़ी राष्ट्रवाद को संकीर्ण या प्रतीकात्मक रूप में नहीं, बल्कि साझा मूल्यों और सामाजिक सहभागिता के रूप में समझ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में दी जा रही नागरिक शिक्षा और समाज में बढ़ती जागरूकता बच्चों की इस परिपक्व सोच के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण है।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि यही सोच आगे भी बनी रही, तो आने वाले वर्षों में ऑस्ट्रेलिया को एक अधिक समावेशी, जिम्मेदार और एकजुट समाज के रूप में विकसित होने में मदद मिलेगी। यह अध्ययन इस बात का संकेत है कि देश का भविष्य केवल उसकी अर्थव्यवस्था या संसाधनों में नहीं, बल्कि उन मूल्यों में निहित है जिन्हें आज के बच्चे समझ और अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।