सिडनी।
ऑस्ट्रेलिया की फैमिली कोर्ट प्रणाली को लेकर कई माता-पिता ने अपनी तकलीफ़ और हताशा साझा की है। किसी ने करोड़ों रुपये झोंक दिए, तो किसी ने मानसिक और शारीरिक शांति खो दी। लेकिन सबसे बड़ा खामियाज़ा बच्चों को उठाना पड़ा, जिन्हें तनाव और असुरक्षा घेर लेती है।
कॉन* नाम के एक पिता ने अपनी फैमिली कोर्ट केस पर लगभग 10 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (करीब 5.5 करोड़ रुपये) खर्च किए। उनका कहना है कि इतनी बड़ी रकम बच्चों के भविष्य पर खर्च हो सकती थी।
जेसिका* बताती हैं कि उनके पूर्व पति ने उन्हें आर्थिक रूप से बर्बाद करने की धमकी दी। बच्चों को बेहतर शिक्षा और जीवन देने के लिए उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूँजी अदालत की कार्यवाही में लगा दी।
एलेक्स* कहते हैं कि अदालत की खींचतान ने उनके बच्चे की खुशियों पर गहरा असर डाला है।
एलिज़ाबेथ* को लगा कि उनके पूर्व पति की कानूनी टीम ने उन्हें “सोने की खान” समझ लिया और “गोल्ड-डिगिंग हाउसवाइफ़” की तरह पेश किया।
पश्चिमी सिडनी विश्वविद्यालय के फैमिली लॉ विशेषज्ञ एंजेलो बिस्टोलारिडिस बताते हैं कि जब माता-पिता के बीच का झगड़ा अदालत में पहुँचता है तो उसका सबसे बड़ा असर बच्चों पर पड़ता है।
“बच्चों में घबराहट और चिंता बढ़ जाती है, वे असुरक्षित महसूस करने लगते हैं,” वे कहते हैं।
2021 में व्हिटलम इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट ने यह भी दर्शाया कि बच्चे अक्सर “बेबस” महसूस करते हैं और उनके अधिकारों को प्रक्रिया में नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
कई माता-पिता का आरोप है कि वकील जानबूझकर मुकदमे को लंबा खींचते हैं ताकि फीस बढ़ाई जा सके। इससे परिवारों पर और बोझ पड़ता है।
“सिस्टम खुद उच्च संघर्ष वाले तलाक़ को बढ़ावा देता है और बच्चों की भलाई पीछे छूट जाती है,” एक माँ ने कहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार कानून प्रणाली में बच्चों के अधिकारों को केंद्र में रखकर बदलाव ज़रूरी है।
निर्णय-प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें बच्चों और परिवार की ज़रूरतें मुख्य रूप से शामिल हों।
एक पिता ने साझा किया कि परिवार-परामर्शदाता (फैमिली थेरेपिस्ट) की मदद से वे “नुकसान की जगह समाधान” पर ध्यान देने लगे।