गरीब और अमीर इलाकों में आंत कैंसर जांच का असमान संतुलन

गरीब और अमीर इलाकों में आंत कैंसर जांच का असमान संतुलन

ऑस्ट्रेलिया में आंत (बॉवेल) कैंसर की जांच को लेकर गंभीर असमानता सामने आई है। शोध और स्वास्थ्य विभाग की ताज़ा रिपोर्टों के मुताबिक, देश के गरीब और पिछड़े इलाकों में बड़ी संख्या में लोग जांच से वंचित रह रहे हैं, जबकि संपन्न इलाकों में लोग अनावश्यक रूप से बार-बार जांच करवा रहे हैं। इसका सीधा असर कैंसर के निदान और इलाज पर पड़ रहा है।

गरीब इलाकों में सबसे बड़ा संकट

पिछड़े और गरीब समुदायों में रहने वाले लोग अक्सर स्वास्थ्य सुविधाओं तक आसानी से नहीं पहुंच पाते। अस्पताल और जांच केंद्र दूर होते हैं, आर्थिक तंगी होती है और जागरूकता की कमी भी बड़ी बाधा बनती है।

  • कई बार लोग शुरुआती लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

  • जब तक अस्पताल पहुंचते हैं, तब तक कैंसर गंभीर अवस्था में पहुंच चुका होता है।

  • इलाज महंगा और कठिन हो जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर की गई कॉलोनोस्कोपी जांच से कैंसर को शुरुआती चरण में पकड़ा जा सकता है, जिससे इलाज आसान और सफल हो सकता है।

अमीर वर्ग में उलटा हाल

इसके विपरीत, संपन्न इलाकों और शहरी बस्तियों में स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां बड़ी संख्या में लोग नियमित अंतराल से जांच करवा रहे हैं, लेकिन कई बार यह चिकित्सकीय दृष्टि से आवश्यक भी नहीं होता।

  • डॉक्टरों का कहना है कि कुछ लोग हर 1-2 साल में जांच दोहराने आ जाते हैं, जबकि दिशा-निर्देश के अनुसार इतनी जल्दी जांच की आवश्यकता नहीं है।

  • इससे स्वास्थ्य प्रणाली पर अनावश्यक बोझ पड़ रहा है।

  • महंगे उपकरण और संसाधन उन लोगों पर खर्च हो रहे हैं जिन्हें फिलहाल जांच की ज़रूरत नहीं है।

विशेषज्ञों की राय

कैंसर विशेषज्ञों और स्वास्थ्य नीति निर्माताओं का मानना है कि यह असमानता बेहद खतरनाक है।

  • गरीब वर्ग में कमी: यहां कैंसर के मामलों का बोझ बढ़ सकता है क्योंकि समय पर निदान नहीं हो पाता।

  • अमीर वर्ग में अतिरेक: यहां अनावश्यक जांचें की जा रही हैं, जिससे असली ज़रूरतमंद मरीजों तक सुविधा नहीं पहुंच पा रही।

एक ऑस्ट्रेलियाई ऑन्कोलॉजिस्ट का कहना है – “हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर व्यक्ति को उसकी ज़रूरत के अनुसार जांच मिले। अनावश्यक जांच रोकनी होंगी और वंचित वर्गों तक सुविधाएं पहुंचानी होंगी।”

सरकार और समाज के लिए चुनौती

यह स्थिति केवल एक मेडिकल मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक और नीतिगत चुनौती भी है। सरकार और स्वास्थ्य संस्थाओं को मिलकर ऐसे कदम उठाने होंगे –

  1. ग्रामीण और गरीब इलाकों में जांच केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए।

  2. जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को शुरुआती लक्षणों के बारे में बताया जाए।

  3. संपन्न वर्ग में अनावश्यक जांचों पर रोक के लिए गाइडलाइन को सख्ती से लागू किया जाए।

  4. संसाधनों का समान और न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित किया जाए।