ऑस्ट्रेलिया, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा नए कपड़ों का उपभोक्ता कहा जाता है, अब एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, ऑस्ट्रेलियाई लोग हर साल करीब 300,000 टन कपड़े कचरे में फेंक देते हैं। ये कपड़े सीधे लैंडफिल में चले जाते हैं, जहां उन्हें गलने में सालों लगते हैं और यह मिट्टी व पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं।
सिडनी के इनर वेस्ट इलाके में एक दुकान इस समस्या को चुनौती दे रही है। यहां पुराने और बेकार समझे जाने वाले कपड़ों को फेंकने के बजाय इकट्ठा किया जाता है और उन्हें नया रूप दिया जाता है। कोई कपड़ा काट-छांट कर डिज़ाइनर परिधान बन जाता है, तो कोई सेकेंड-हैंड जैकेट या जीन्स नए स्टाइल में बदलकर फिर से बिकने लायक हो जाती है। इस प्रक्रिया को अपसाइक्लिंग कहा जाता है।
युवाओं के बीच एक नया चलन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है—“थ्रिफ्ट फ्लिपिंग”। इसका मतलब है पुरानी या सेकेंड-हैंड वस्त्रों को खरीदकर उन्हें नया रूप देना और पुनः पहनना या बेचना। इस ट्रेंड ने न केवल कचरा घटाने में मदद की है बल्कि युवाओं को अपनी रचनात्मकता और व्यक्तिगत स्टाइल दिखाने का भी मौका दिया है।
फैशन उद्योग वैश्विक स्तर पर पानी की बर्बादी और कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ऑस्ट्रेलिया जैसे देश सतत फैशन की दिशा में बढ़ते रहे, तो कपड़ा कचरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
लैंडफिल में कपड़ों का बोझ घटेगा
पुनर्चक्रण से संसाधनों की बचत होगी
उपभोक्ताओं को किफायती व टिकाऊ फैशन विकल्प मिलेंगे
आज जहां बड़ी-बड़ी फैशन कंपनियां लगातार नए कलेक्शन लॉन्च कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर अपसाइक्लिंग और थ्रिफ्ट फ्लिपिंग जैसे प्रयास एक नई सोच को जन्म दे रहे हैं। यह सोच न केवल फैशन को नया आयाम दे रही है, बल्कि पृथ्वी को बचाने की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।