अमेरिका के मिनेसोटा राज्य में सामने आए एक बड़े कल्याणकारी (वेलफेयर) घोटाले ने देशभर में हलचल मचा दी है। इस मामले में अमेरिकी संघीय जांच एजेंसी एफबीआई ने जांच के लिए अतिरिक्त संसाधन और कर्मियों की तैनाती की है। अधिकारियों का कहना है कि यह मामला “अब तक के सबसे बड़े घोटालों में से एक” हो सकता है।
एफबीआई निदेशक काश पटेल ने कहा कि एजेंसी को संदेह है कि यह घोटाला केवल “एक बहुत बड़े हिमखंड का सिरा” है और जांच अभी जारी है। उनके अनुसार, यह धोखाधड़ी सरकारी धन की लूट और बच्चों के नाम पर किए गए फर्जी दावों से जुड़ी है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, मिनेसोटा में कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने कोविड-19 के दौरान शुरू की गई बाल पोषण योजना सहित कई सरकारी योजनाओं में भारी धोखाधड़ी की। आरोप है कि इन लोगों ने यह दावा किया कि वे हजारों बच्चों को भोजन और देखभाल सेवाएं दे रहे हैं, जबकि जांच में कई केंद्र खाली या अस्तित्वहीन पाए गए।
प्राथमिक अनुमान के मुताबिक, इस घोटाले में करीब 9 अरब अमेरिकी डॉलर तक की राशि का दुरुपयोग हो सकता है। अब तक दर्जनों लोगों पर आरोप तय किए जा चुके हैं और कई को दोषी ठहराया गया है।
यह मामला हाल के दिनों में तब और चर्चा में आया जब एक यूट्यूबर निक शर्ली ने मिनेसोटा में कथित डे-केयर और चाइल्ड केयर सेंटरों की जांच करते हुए वीडियो जारी किया। वीडियो में उन्होंने ऐसे कई स्थान दिखाए जहां सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार सैकड़ों बच्चे पंजीकृत थे, लेकिन मौके पर एक भी बच्चा मौजूद नहीं था।
उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और करोड़ों बार देखा गया, जिसके बाद संघीय एजेंसियों पर जांच तेज करने का दबाव बढ़ा।
इस घोटाले को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज हो गई है। रिपब्लिकन नेताओं ने मिनेसोटा के डेमोक्रेटिक प्रशासन पर लापरवाही के आरोप लगाए हैं, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी ने इसे कानून प्रवर्तन का विषय बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
एफबीआई ने स्पष्ट किया है कि दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और जरूरत पड़ने पर आव्रजन कानूनों के तहत भी कदम उठाए जा सकते हैं।
एफबीआई का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण से आगे बढ़ रही है और आने वाले समय में और गिरफ्तारियां व खुलासे संभव हैं। एजेंसी का मुख्य लक्ष्य सरकारी धन की रक्षा करना और बच्चों के नाम पर की गई धोखाधड़ी को पूरी तरह उजागर करना है।