AUKUS (ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स) रक्षा समझौते के तहत खरबों डॉलर के रक्षा खर्च की योजना से पहले, ऑस्ट्रेलिया में एक चौंकाने वाली प्रवृत्ति सामने आई है—पूर्व प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, और सेना के वरिष्ठ अधिकारी अब रक्षा ठेकेदारों और परामर्शदाताओं की टीम का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
जहां एक ओर यह समझौता ऑस्ट्रेलिया की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर, सत्ता के गलियारों से उद्योग तक का यह 'रिवॉल्विंग डोर' सवालों के घेरे में आ गया है।
पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व रक्षा मंत्री से लेकर रिटायर्ड जनरल तक—कई पूर्व जनप्रतिनिधियों और सैन्य अधिकारियों ने हाल ही में रक्षा उद्योग से जुड़ी बड़ी कंपनियों में सलाहकार, निदेशक या लॉबिस्ट की भूमिका निभानी शुरू कर दी है।
इनमें से कुछ नाम ऐसे हैं जो कभी संसद में रक्षा नीति के फैसले करते थे, और अब उन्हीं नीतियों से लाभ कमाने वाले निजी ठेकेदारों के लिए काम कर रहे हैं।
AUKUS समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया को अत्याधुनिक परमाणु पनडुब्बियां और उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी मिलनी है। अनुमानित कुल लागत $368 बिलियन (लगभग ₹25 लाख करोड़) से अधिक बताई जा रही है। ऐसे में, रक्षा ठेकेदारों और अंतरराष्ट्रीय हथियार कंपनियों के लिए यह एक सुनहरा अवसर है—और यह वही मौका है जिसे सत्ता छोड़ चुके प्रभावशाली लोग भुना रहे हैं।
न्यायिक विशेषज्ञों और पारदर्शिता संगठनों का कहना है कि यह स्थिति 'हितों के टकराव' (conflict of interest) की मिसाल बन सकती है। जब नीति निर्धारक निजी लाभ के लिए उन्हीं कंपनियों से जुड़ते हैं जिनके लिए उन्होंने पहले नियम बनाए, तो लोकतंत्र और निष्पक्षता पर सवाल उठना लाज़मी है।
ऑस्ट्रेलिया में आम लोग और कार्यकर्ता इस 'कॉरपोरेट रक्षा गठजोड़' को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं। "जनता की सुरक्षा के नाम पर जो पैसा खर्च हो रहा है, वह अब चुनिंदा लोगों की जेब में जा रहा है," एक नागरिक अधिकार संगठन के प्रमुख ने कहा।