अल्बानीज़े की ट्रंप से मुलाकात पर टिकी ऑस्ट्रेलिया की उम्मीदें

अल्बानीज़े की ट्रंप से मुलाकात पर टिकी ऑस्ट्रेलिया की उम्मीदें

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़े इस समय एक बेहद नाजुक कूटनीतिक दौर से गुजर रहे हैं। पापुआ न्यू गिनी (PNG) के साथ उनकी सरकार द्वारा लंबे समय से तैयार की जा रही ऐतिहासिक रक्षा संधि अचानक ठप पड़ गई है। यह संधि ऑस्ट्रेलिया और पीएनजी के बीच सुरक्षा सहयोग को गहराई देने वाला कदम माना जा रहा था। परंतु इसके असफल होने से ऑस्ट्रेलिया को न केवल रणनीतिक झटका लगा है, बल्कि प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल के बीच उसकी स्थिति भी असहज हो गई है।

ट्रंप से मुलाकात का महत्व

अब सारी निगाहें प्रधानमंत्री अल्बानीज़े की अमेरिका यात्रा और वहां होने वाली राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से उच्चस्तरीय मुलाकात पर टिकी हैं। कूटनीतिक हलकों का मानना है कि यह वार्ता केवल द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि इसका सीधा असर पूरे प्रशांत क्षेत्र के शक्ति-संतुलन पर पड़ेगा।

ऑस्ट्रेलिया की कोशिश होगी कि अमेरिका प्रशांत द्वीप समूहों में अपनी सक्रियता और निवेश बढ़ाए। चीन पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और सुरक्षा सहयोग के नाम पर प्रभाव मजबूत कर रहा है। यदि अमेरिका निर्णायक रूप से आगे नहीं बढ़ा, तो क्षेत्र में चीन की पकड़ और गहरी हो सकती है।

विपक्ष और रणनीतिक विशेषज्ञों की राय

ऑस्ट्रेलियाई विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ लगातार यह कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री को ट्रंप पर दबाव बनाना चाहिए। उनका तर्क है कि यदि अमेरिका ने अभी ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा और कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि अल्बानीज़े को ट्रंप से यह स्पष्ट संदेश लेना चाहिए कि अमेरिका प्रशांत क्षेत्र में लोकतांत्रिक देशों का मजबूत साथी बना रहेगा। इसके बिना ऑस्ट्रेलिया की रणनीति अधूरी रहेगी।

भविष्य की दिशा

इस मुलाकात को अल्बानीज़े की विदेश नीति का निर्णायक क्षण भी कहा जा रहा है। पीएनजी संधि पर असफलता के बाद यदि वे अमेरिका से ठोस प्रतिबद्धता दिलाने में सफल होते हैं, तो न केवल उनका राजनीतिक कद बढ़ेगा बल्कि ऑस्ट्रेलिया का क्षेत्रीय प्रभाव भी मज़बूत होगा। परंतु यदि वार्ता अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाती, तो यह उनकी कूटनीतिक विफलता मानी जाएगी और चीन के पक्ष में माहौल और अनुकूल हो जाएगा।

संक्षेप में, यह मुलाकात केवल एक औपचारिक राजनयिक वार्ता नहीं, बल्कि प्रशांत महासागर में भविष्य की शक्ति-राजनीति को आकार देने वाला ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है।