ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ ने ऐलान किया है कि उनका देश आने वाले वर्षों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सीट के लिए अपनी दावेदारी पेश करेगा। यह कोशिश आसान नहीं होगी, क्योंकि इसके लिए लंबा इंतज़ार, कूटनीतिक मेहनत और करोड़ों डॉलर का निवेश करना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री अल्बानीज़ ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कहा, “यदि दुनिया किसी भी देश को नियमों के बाहर काम करने देती है, तो हर राष्ट्र की संप्रभुता खतरे में आ जाएगी।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऑस्ट्रेलिया नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने और छोटे-बड़े सभी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 10 अस्थायी सीटों के लिए चुनाव हर दो साल में होता है। सदस्य देशों को इसके लिए महासभा के 193 सदस्यों से बहुमत का समर्थन हासिल करना पड़ता है।
ऑस्ट्रेलिया को अपने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
इसके लिए वर्षों तक लगातार कूटनीतिक अभियान चलाना होगा।
छोटे देशों के साथ व्यापार, मानवीय सहायता और विकास सहयोग जैसी योजनाओं के जरिए समर्थन जुटाना पड़ेगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस अभियान में करोड़ों डॉलर खर्च होंगे।
राजनयिक नेटवर्क का विस्तार
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी
सहायता और निवेश कार्यक्रमों के जरिए समर्थन हासिल करना
ये सभी कदम अभियान का अहम हिस्सा होंगे।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े फैसलों का सबसे बड़ा मंच है।
अस्थायी सदस्य बनने से ऑस्ट्रेलिया सीधे तौर पर वैश्विक फैसलों में भूमिका निभा सकेगा।
यह ऑस्ट्रेलिया की साख और प्रभाव को बढ़ाएगा।
अल्बानीज़ सरकार इसे राष्ट्रीय हित और जिम्मेदारी के तौर पर देख रही है।
2012 में ऑस्ट्रेलिया ने आखिरी बार UNSC की अस्थायी सीट हासिल की थी। उस समय सरकार ने लंबे कूटनीतिक अभियान और व्यापक निवेश के बाद यह जीत पाई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा चुनौती पहले से भी कठिन होगी, क्योंकि वैश्विक राजनीति अब और अधिक जटिल हो चुकी है।
👉 यह साफ है कि अल्बानीज़ का यह कदम न केवल ऑस्ट्रेलिया की विदेश नीति को नई दिशा देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी आवाज़ को और मज़बूती से पेश करेगा।