ऑस्ट्रेलिया में घृणा समूहों और निर्वासन कानून पर समझौते के करीब सरकार

ऑस्ट्रेलिया में घृणा समूहों और निर्वासन कानून पर समझौते के करीब सरकार

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री Anthony Albanese की सरकार घृणा फैलाने वाले संगठनों पर प्रतिबंध और चरमपंथियों के निर्वासन से जुड़े कानून पर विपक्ष के साथ समझौते के करीब पहुंच गई है। इस मुद्दे पर संसद का विशेष सत्र जारी है, जहां भावनात्मक माहौल में बहस हो रही है।

लिबरल पार्टी की नेता Sussan Ley ने पहले इस विधेयक को “अस्वीकार्य” बताया था, लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि विपक्ष सरकार को सीमित समर्थन देने के लिए तैयार है। यह बदलाव तब आया जब सरकार ने विवादास्पद एंटी-विलिफिकेशन (अपमान विरोधी) प्रावधानों को विधेयक से हटाने पर सहमति जताई।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री ने विपक्ष से आग्रह किया है कि विधेयक के हर हिस्से पर अलग-अलग विचार किया जाए। जिन प्रावधानों को विपक्ष का समर्थन मिलेगा, उन्हें पारित किया जाएगा, जबकि असहमति वाले हिस्सों को हटाया जा सकता है। यह रुख प्रधानमंत्री के पहले के सख्त रुख से अलग माना जा रहा है।

घृणा समूहों पर सख्ती, निर्वासन पर जोर

संशोधित प्रस्तावों में नव-नाज़ी संगठनों और इस्लामी कट्टरपंथी संगठन हिज़्ब उत-तहरीर जैसे समूहों को प्रतिबंधित करने की योजना शामिल है। इसके अलावा, ऐसे गैर-नागरिक जो हिंसा भड़काने, आतंकवाद का समर्थन करने या धार्मिक घृणा फैलाने में शामिल पाए जाएंगे, उन्हें देश से निर्वासित किया जा सकेगा।

सुश्री ले ने स्पष्ट कहा है कि यदि कोई व्यक्ति कट्टरपंथी इस्लामी घृणा या आतंकवाद का महिमामंडन करता है और वह ऑस्ट्रेलियाई नागरिक नहीं है, तो उसे निर्वासित किया जाएगा, जबकि नागरिक होने की स्थिति में उस पर आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।

गन कानून अलग विधेयक में

सरकार ने नए गन बायबैक कार्यक्रम को भी अलग विधेयक के रूप में पेश करने का फैसला किया है। इस प्रस्ताव को ग्रीन्स पार्टी का समर्थन मिलने की संभावना है। पहले सरकार सभी उपायों को एक साथ पारित कराने पर अड़ी हुई थी, लेकिन अब राजनीतिक सहमति के लिए कानूनों को अलग-अलग करने का रास्ता अपनाया गया है।

सामुदायिक संगठनों की अपील

ऑस्ट्रेलियाई यहूदी समुदाय के प्रतिनिधियों ने प्रमुख राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे मिलकर ऐसे प्रभावी कानून बनाएं, जो नस्लीय घृणा और हिंसा के जानबूझकर प्रचार को रोक सकें।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समझौता सफल होता है, तो यह हाल के वर्षों में राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव से जुड़े सबसे अहम विधायी कदमों में से एक होगा।