नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर इंडिया गठबंधन ने जिस नाम की घोषणा की, उसने राजनीतिक हलचल मचा दी है। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी. सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाकर विपक्ष ने साफ संकेत दिया है कि वह इस चुनाव को "नैतिकता बनाम सत्ता" की जंग के रूप में पेश करना चाहता है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस निर्णय में विपक्ष ने रणनीतिक दृष्टि से चूक कर दी है?
रेड्डी की छवि ईमानदार, सख्त और न्यायप्रिय जज की रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कई ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहते हुए न्यायपालिका में निष्पक्षता की पहचान बनाई। यही वजह है कि इंडिया गठबंधन ने उन्हें उम्मीदवार बनाकर एक साफ-सुथरा संदेश देने की कोशिश की कि सत्ता की राजनीति से परे जाकर देश को एक ऐसा उपराष्ट्रपति दिया जा सकता है जो निष्पक्षता और संविधान की मर्यादा को सर्वोपरि रखे।
हालांकि, राजनीति केवल छवि से नहीं चलती, उसमें जनाधार और समीकरण भी अहम होते हैं। यही वह बिंदु है जहां विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष के पास इस समय अवसर था कि वह दलित, पिछड़े वर्ग या किसी बड़े क्षेत्रीय नेता को उम्मीदवार बनाकर सत्तापक्ष को घेरता। ऐसा करने से न केवल चुनावी समीकरण मजबूत होते बल्कि विपक्ष जनता के बीच यह संदेश देने में भी सफल होता कि वह सामाजिक न्याय और जनभागीदारी के मुद्दे पर गंभीर है।
इसके विपरीत, गैर-राजनीतिक नाम सामने लाकर विपक्ष ने अपनी रणनीति को कमजोर कर दिया है। ग्रामीण और गरीब तबकों से लेकर अल्पसंख्यक और क्षेत्रीय आकांक्षाओं तक, विपक्ष का यह चयन इन वर्गों को विशेष रूप से आकर्षित नहीं कर पा रहा।
एनडीए के उम्मीदवार की तुलना में रेड्डी का नाम राजनीतिक दृष्टि से फीका पड़ता दिखाई दे रहा है। भाजपा और उसके सहयोगी दल इसे विपक्ष की "रणनीतिक चूक" के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं। सत्ता पक्ष का मानना है कि विपक्ष ने अनुभव और जनसंपर्क के मामले में हल्का नाम आगे रखकर खुद अपने पाले को कमजोर किया है।
राजनीतिक तौर पर यह कदम एनडीए को फायदा पहुंचा सकता है, क्योंकि जहां एक ओर उसका उम्मीदवार संगठित जनाधार और राजनीतिक नेटवर्किंग से लैस है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष केवल ‘निष्पक्षता’ की दलील पर जनता को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है।
विपक्ष का तर्क है कि राजनीति में कभी-कभी नैतिक प्रतीक खड़ा करना भी ज़रूरी होता है। रेड्डी के चयन को इसी दृष्टि से देखा जा रहा है। लेकिन व्यावहारिक राजनीति में केवल नैतिकता काफी नहीं होती, वहाँ जातीय संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक मजबूती जैसे कारक भी निर्णायक साबित होते हैं।
यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि विपक्ष ने इस बार जनता के बीच गहराई से जुड़ने का अवसर गंवा दिया।