सिडनी।
2025 में वो ज़माना ख़त्म हो चुका है जब बेबी बूमर पीढ़ी का वित्तीय प्लेबुक आज़माकर लोग आराम से अमीर बन जाते थे। अब वही रास्ता अपनाना, खासकर युवाओं के लिए, एक "मनी ट्रैप" साबित हो रहा है।
बीते दशकों में ऑस्ट्रेलिया में अमीर बनने का रास्ता सीधा था – जल्द से जल्द घर खरीदो, कर्ज़ उतारो, सुपरएनुएशन में पैसा डालो और चाहो तो एक इन्वेस्टमेंट प्रॉपर्टी ले लो।
लेकिन ये फॉर्मूला ऐसे दौर में काम आया जब घर किफ़ायती थे, असली वेतन लगातार बढ़ रहा था और टैक्स बचाने के मौके भरपूर थे।
आज तस्वीर उलट चुकी है।
सिडनी का वही घर जो 1990 के दशक में करीब $1 लाख का था, अब $20 लाख तक पहुंच चुका है।
आय इतनी नहीं बढ़ी।
महंगाई, ठहरी हुई तनख्वाहें, चाइल्डकेयर का बोझ और रोज़मर्रा के खर्चे युवा पीढ़ी को जकड़े हुए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, आज की पीढ़ी अक्सर इन गलतियों में फँस जाती है:
बहुत जल्दी घर खरीद लेना और कर्ज़ में दब जाना।
सिर्फ़ बचत करना लेकिन निवेश न करना, जिससे महंगाई बैंक बैलेंस को खोखला कर देती है।
सुपर फंड पर अंधा भरोसा करना, जबकि ये पैसा दशकों तक हाथ में नहीं आता।
फाइनेंशियल एडवाइज़र बेन नैश के मुताबिक अब समय आ गया है कि पुरानी किताब बंद करके नई रणनीति अपनाई जाए।
पहले निवेश, बाद में घर – “रेन्टवेस्टिंग” का चलन बढ़ रहा है; जहां रहना चाहो वहां किराए पर रहो, लेकिन निवेश उस जगह करो जहां प्रॉपर्टी से रिटर्न मिल सके।
पैसे को काम पर लगाओ – सेविंग अकाउंट में रखने से बेहतर है कि शेयर, ETF या सुरक्षित क्रिप्टो में नियमित निवेश किया जाए।
टैक्स को हथियार बनाओ – सैलरी सैक्रिफाइस, नेगेटिव गियरिंग, डेब्ट रीसायक्लिंग जैसी रणनीतियाँ संपत्ति बनाने में मददगार हो सकती हैं।
कमाई बढ़ाओ – स्किल्स अपग्रेड करना, नौकरी बदलना, साइड हसल शुरू करना; सेविंग की सीमा है, लेकिन कमाई की नहीं।
पुरानी पीढ़ी के नियम आज भी अपनी जगह अहमियत रखते हैं – जितना कमाओ उससे कम खर्च करो और निवेश करो। लेकिन अब उन्हें नए ज़माने की अर्थव्यवस्था के हिसाब से ढालने की ज़रूरत है।
अब 30 की उम्र तक घर का मालिक होना ज़रूरी नहीं, स्टॉक चुनने का एक्सपर्ट होना भी ज़रूरी नहीं।
असल ज़रूरत है लचीलापन अपनाने की और अपने लिए नया वित्तीय प्लेबुक लिखने की।