बच्चों की देखभाल पर सियासी संग्राम तेज, विपक्ष ने टैक्स छूट और इनकम स्प्लिटिंग का दिया संकेत

यूनिवर्सल चाइल्डकेयर पर सरकार की नीति को चुनौती, नैनी और दादा-दादी को भुगतान के विकल्प पर भी विचार

बच्चों की देखभाल पर सियासी संग्राम तेज, विपक्ष ने टैक्स छूट और इनकम स्प्लिटिंग का दिया संकेत

आगामी चुनाव से पहले बच्चों की देखभाल (चाइल्डकेयर) का मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। सरकार की ‘सार्वभौमिक चाइल्डकेयर’ नीति को जहां सामाजिक सुरक्षा के बड़े कदम के रूप में पेश किया जा रहा है, वहीं विपक्ष ने इसे चुनौती देते हुए वैकल्पिक मॉडल का संकेत दिया है। विपक्षी दल ने कहा है कि वह अभिभावकों को टैक्स में रियायत, आय-विभाजन (इनकम स्प्लिटिंग) और नैनी या दादा-दादी की मदद के लिए सीधे आर्थिक सहयोग जैसे विकल्पों पर विचार करेगा।

सरकार का दावा है कि उसकी यूनिवर्सल चाइल्डकेयर योजना कामकाजी माता-पिता, विशेषकर महिलाओं, को रोजगार में बने रहने और परिवारों पर आर्थिक बोझ कम करने में मदद करेगी। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में इस नीति को “परिवार-हितैषी सुधार” और “आर्थिक भागीदारी बढ़ाने वाला कदम” बताया जा रहा है।

विपक्ष का तर्क है कि सभी परिवारों की जरूरतें एक जैसी नहीं होतीं। कई परिवार औपचारिक डे-केयर केंद्रों की बजाय घर पर नैनी रखने या दादा-दादी की देखभाल को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में कर छूट और आय-विभाजन जैसे उपाय परिवारों को अपनी पसंद के अनुसार व्यवस्था चुनने की आजादी देंगे। विपक्षी नेताओं के अनुसार, “सरकारी मॉडल थोपने के बजाय लचीले विकल्प देना ज्यादा न्यायसंगत होगा।”

विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों मॉडलों के अपने फायदे और चुनौतियां हैं। एक ओर सार्वभौमिक चाइल्डकेयर से संगठित क्षेत्र को मजबूती मिल सकती है और गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित किया जा सकता है, वहीं टैक्स छूट और प्रत्यक्ष भुगतान से परिवारों को लचीलापन मिलेगा, लेकिन इससे सरकारी राजस्व पर असर पड़ सकता है।

आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी माहौल में यह मुद्दा मध्यमवर्गीय और कामकाजी परिवारों के लिए अहम साबित हो सकता है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि मतदाता किस मॉडल को अधिक भरोसेमंद और व्यावहारिक मानते हैं।

फिलहाल इतना तय है कि बच्चों की देखभाल का विषय अब केवल सामाजिक नीति नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का भी केंद्र बन चुका है।