‘डाउन डाउन’ प्रमोशन पर उठे सवाल: अंदरूनी ईमेल से कोल्स की मूल्य निर्धारण नीति पर बहस तेज

‘डाउन डाउन’ प्रमोशन पर उठे सवाल: अंदरूनी ईमेल से कोल्स की मूल्य निर्धारण नीति पर बहस तेज

ऑस्ट्रेलिया की प्रमुख सुपरमार्केट श्रृंखला Coles Group एक बार फिर अपने चर्चित ‘डाउन डाउन’ प्रमोशन अभियान को लेकर विवादों में है। हाल ही में सामने आए एक आंतरिक ईमेल से खुलासा हुआ है कि कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने छूट से पहले कीमतों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखने की रणनीति पर चिंता जताई थी। इस खुलासे के बाद खुदरा बाजार में पारदर्शिता और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है।

12 सप्ताह तक ऊंची कीमत, फिर ‘छूट’ का प्रचार

रिपोर्ट्स के अनुसार, कोल्स ने कई उत्पादों की कीमतें कम से कम 12 सप्ताह तक बढ़ी हुई स्तर पर बनाए रखीं। इसके बाद उन्हीं वस्तुओं को ‘डाउन डाउन’ अभियान के तहत छूट के साथ प्रचारित किया गया। आंतरिक संचार में यह आशंका व्यक्त की गई थी कि इतनी लंबी अवधि तक ऊंची कीमत रखने के बाद अचानक छूट दिखाना ग्राहकों को भ्रमित कर सकता है।

कंपनी के कुछ कर्मचारियों का मानना था कि यदि कीमतें पहले कृत्रिम रूप से बढ़ाई जाती हैं और बाद में उन्हें कम कर “बड़ी छूट” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो यह उपभोक्ताओं के भरोसे पर असर डाल सकता है।

प्रतिस्पर्धा का दबाव

ईमेल में प्रतिस्पर्धी सुपरमार्केट Woolworths Group का भी उल्लेख किया गया। बताया गया कि वूलवर्थ्स अपेक्षाकृत कम अवधि के लिए कीमतें बढ़ाकर बाद में छूट देता है। इस तुलना ने कोल्स के भीतर रणनीतिक स्तर पर चर्चा को जन्म दिया कि क्या उनकी मूल्य निर्धारण नीति बाजार में प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता धारणा के लिहाज से सही है।

उपभोक्ता अधिकारों पर सवाल

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी कंपनी द्वारा कीमतों में वृद्धि और फिर छूट का प्रचार भ्रामक तरीके से किया जाता है, तो यह उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के तहत जांच का विषय बन सकता है। उपभोक्ता संगठनों ने मांग की है कि खुदरा कंपनियां स्पष्ट रूप से बताएं कि किसी भी छूट से पहले उत्पाद की मूल कीमत कितनी अवधि तक लागू रही थी।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ती महंगाई के दौर में ग्राहक कीमतों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं। ऐसे में किसी भी तरह की मूल्य रणनीति, जो पारदर्शी न हो, ब्रांड की साख को नुकसान पहुंचा सकती है।

कंपनी की प्रतिक्रिया का इंतजार

फिलहाल इस मुद्दे पर कोल्स की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, यह मामला ऑस्ट्रेलिया के खुदरा क्षेत्र में मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में नियामक एजेंसियां इस तरह की प्रचार रणनीतियों की गहन समीक्षा कर सकती हैं, ताकि ग्राहकों को वास्तविक और पारदर्शी छूट का लाभ मिल सके।