काठमांडू, 12 सितम्बर 2025 — नेपाल की राजनीति में अस्थिरता और लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध के बीच शुक्रवार देर रात राष्ट्रपति भवन (शीतल निवास) में एक ऐतिहासिक बैठक हुई। इस बैठक में अंतरिम सरकार गठन को लेकर महत्वपूर्ण सहमति बनी और सूत्रों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है।
इस विशेष बैठक में कई बड़े संवैधानिक पदाधिकारी और वरिष्ठ नेता शामिल हुए।
राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की मौजूदगी में हुई बैठक में प्रधान सेनापति अशोक राज सिग्देल,
सुप्रीम कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की,
प्रतिनिधि सभा के स्पीकर देवराज घिमिरे,
राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष नारायण दहाल,
तथा कई संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ कानूनविद उपस्थित रहे।
सभी ने मिलकर मौजूदा राजनीतिक संकट से निपटने और देश को चुनाव की ओर ले जाने के लिए अंतरिम व्यवस्था पर चर्चा की।
बैठक में लिए गए निर्णय नेपाल के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं:
मौजूदा संसद को भंग करने पर आम सहमति बनी।
देश में अगले छह महीनों के भीतर आम चुनाव कराने का निर्णय हुआ।
इस अवधि के लिए एक निष्पक्ष और न्यायपूर्ण अंतरिम सरकार गठित करने की जरूरत पर बल दिया गया।
अंतरिम सरकार की कमान सुशीला कार्की को सौंपने का प्रस्ताव सबसे मजबूत माना गया।
नेपाल पिछले कई महीनों से गहरे राजनीतिक संकट में है। सरकार और विपक्ष के बीच टकराव, जनता के लगातार विरोध-प्रदर्शन और Gen-Z आंदोलन की उभरती ताकत ने देश को अस्थिर कर दिया है।
युवाओं और आम नागरिकों में यह भावना गहरी होती जा रही थी कि मौजूदा सरकार जन-आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रही है। इसी कारण, अंतरिम सरकार को एक निष्पक्ष विकल्प मानते हुए सभी पक्ष इस व्यवस्था की ओर बढ़े हैं।
सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं।
न्यायपालिका में अपने सख्त और ईमानदार रुख के लिए वह जानी जाती हैं।
राजनीतिक दलों के बीच यह विश्वास बना कि वह किसी भी पार्टी से पक्षपात किए बिना निष्पक्ष सरकार चला सकती हैं।
युवाओं और सिविल सोसाइटी में उनके नाम को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दिख रही है।
अगर सुशीला कार्की अंतरिम प्रधानमंत्री बनती हैं, तो उनके सामने कई गंभीर चुनौतियाँ होंगी:
शांति और स्थिरता बनाए रखना — देशभर में विरोध प्रदर्शनों और आंदोलन को शांतिपूर्ण ढंग से नियंत्रित करना।
चुनाव की तैयारी — छह महीने के भीतर निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराना आसान नहीं होगा।
राजनीतिक दलों का दबाव — विभिन्न दलों की अपेक्षाएँ और दबाव उनके निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।
आर्थिक संकट से निपटना — राजनीतिक अस्थिरता ने अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है, जिसे संभालना जरूरी होगा।
युवा वर्ग और नागरिक समाज ने इस पहल का स्वागत किया है। उनका मानना है कि यह कदम लोकतंत्र को मजबूत करेगा और जन-आकांक्षाओं के अनुरूप होगा।
हालांकि, कुछ विपक्षी दलों ने संसद भंग करने के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इससे संवैधानिक संकट गहरा सकता है।