कैनबरा।
संघीय सरकार द्वारा बजट घाटे को कम करने के उद्देश्य से रक्षा विभाग की अचल संपत्तियों को बेचने की योजना पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। रक्षा विशेषज्ञों, पूर्व सैन्य अधिकारियों और नीति विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि इस कदम से देश के प्रमुख महानगरों के केंद्रीय क्षेत्रों से सेना की मौजूदगी लगभग समाप्त हो सकती है, जिसका सीधा और दूरगामी असर सैन्य भर्ती, कर्मियों के मनोबल और सेवाकाल पर पड़ेगा।
आलोचकों का कहना है कि जिन रक्षा परिसरों, प्रशासनिक कार्यालयों और आवासीय संपत्तियों को बेचने का प्रस्ताव है, वे केवल जमीन या इमारतें नहीं हैं, बल्कि सेना और आम नागरिकों के बीच एक मजबूत प्रतीकात्मक और व्यावहारिक सेतु का काम करती हैं। बड़े शहरों के मध्य स्थित सैन्य प्रतिष्ठान युवाओं को सेना के प्रति आकर्षित करने, सम्मान की भावना जगाने और सैन्य सेवा को एक प्रतिष्ठित करियर विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
पूर्व सैन्य अधिकारियों का मानना है कि यदि सेना को शहरों के बाहरी इलाकों या दूरदराज़ क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया, तो इससे न केवल दैनिक संचालन और पारिवारिक जीवन प्रभावित होगा, बल्कि योग्य युवाओं को सेना में आने के लिए प्रेरित करना भी कठिन हो जाएगा। पहले से ही कई रक्षा बल भर्ती में कमी और प्रशिक्षित कर्मियों के समय से पहले इस्तीफों की समस्या से जूझ रहे हैं।
विशेषज्ञों ने इस प्रस्तावित बिक्री को “फायर सेल” करार देते हुए कहा है कि अल्पकालिक वित्तीय राहत के लिए लिए गए ऐसे फैसले दीर्घकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। उनका तर्क है कि एक बार रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थित संपत्तियां बिक जाने के बाद, भविष्य में उन्हें दोबारा हासिल करना लगभग असंभव होगा।
विपक्षी दलों ने भी सरकार के इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा है कि रक्षा जैसी संवेदनशील और रणनीतिक व्यवस्था को बजटीय संतुलन का साधन बनाना उचित नहीं है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को खर्चों में कटौती और राजस्व बढ़ाने के अन्य विकल्प तलाशने चाहिए, न कि सैन्य ढांचे को कमजोर करने वाले उपाय अपनाने चाहिए।
वहीं सरकार का पक्ष है कि कम उपयोग में आने वाली या गैर-आवश्यक संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त धन को आधुनिक हथियार प्रणालियों, तकनीकी उन्नयन और रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में लगाया जाएगा। हालांकि आलोचकों का कहना है कि सेना की ताकत केवल आधुनिक उपकरणों से नहीं, बल्कि उसके कर्मियों के मनोबल, सामाजिक जुड़ाव और जीवन की गुणवत्ता से भी तय होती है।
कुल मिलाकर, रक्षा संपत्तियों की प्रस्तावित बिक्री को लेकर बहस केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बनती जा रही है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस व्यापक आलोचना के बीच अपने फैसले में कोई बदलाव करती है या नहीं।