एक प्रमुख मनोचिकित्सक डॉ. एंड्रयू एमोस पर स्वास्थ्य नियामक संस्था ने सोशल मीडिया पर जेंडर-अफर्मिंग (लिंग-पुष्टि) उपचार से संबंधित टिप्पणियां करने के बाद प्रतिबंध लगा दिया है। यह कार्रवाई ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं की शिकायतों के बाद की गई।
सूत्रों के अनुसार, डॉ. एमोस ने नाबालिगों के लिए जेंडर-अफर्मिंग उपचार की प्रक्रिया, उसके दीर्घकालिक प्रभावों और चिकित्सा मानकों पर सवाल उठाए थे। इन पोस्टों को लेकर कुछ समूहों ने आरोप लगाया कि उनकी टिप्पणियां ट्रांस समुदाय के प्रति संवेदनशील नहीं थीं और इससे भेदभाव को बढ़ावा मिल सकता है।
स्वास्थ्य नियामक ने अपने आदेश में कहा कि चिकित्सकों को सार्वजनिक मंचों पर विचार व्यक्त करते समय पेशेवर आचार संहिता और समुदाय के हितों का ध्यान रखना चाहिए। नियामक संस्था का कहना है कि चिकित्सा से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक बयान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और संवेदनशील होने चाहिए, विशेषकर तब जब मामला बच्चों और किशोरों के उपचार से संबंधित हो।
वहीं, डॉ. एमोस के समर्थकों का तर्क है कि चिकित्सा पद्धतियों पर वैज्ञानिक बहस को दबाया नहीं जाना चाहिए। उनका कहना है कि उपचार के दीर्घकालिक प्रभावों पर खुली चर्चा चिकित्सा समुदाय और समाज दोनों के हित में है। वे इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा भी बता रहे हैं।
दूसरी ओर, ट्रांसजेंडर अधिकार संगठनों ने नियामक के कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि जेंडर-अफर्मिंग उपचार कई युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है और सार्वजनिक मंचों पर भ्रामक या अपूर्ण जानकारी से समुदाय को नुकसान पहुंच सकता है।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया भर में जेंडर-अफर्मिंग चिकित्सा, विशेषकर बच्चों और किशोरों के लिए, नीति और नैतिकता के स्तर पर बहस का विषय बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर वैज्ञानिक शोध, चिकित्सकीय दिशानिर्देश और सामाजिक संवेदनशीलता—तीनों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
मामले की अगली सुनवाई या समीक्षा की तिथि अभी घोषित नहीं की गई है।