प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में आतंकवाद का मुद्दा प्रमुख रहा। भारत के विदेश मंत्रालय ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने सीमा पार आतंकवाद पर चिंता जताई और चीन से सहयोग मांगा, जिस पर बीजिंग ने भारत का साथ देने का भरोसा जताया।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा, “प्रधानमंत्री ने बहुत स्पष्ट रूप से यह मुद्दा उठाया और बताया कि आतंकवाद भारत और चीन दोनों को प्रभावित करता है। उन्होंने चीन से समर्थन मांगा, और चीनी नेतृत्व ने इस पर सहमति जताई।”
गौरतलब है कि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की पृष्ठभूमि में यह चर्चा हुई। पहले चीन ने पाकिस्तान के दबाव में पहलगाम हमले का ज़िक्र संयुक्त बयान से हटाया था और इसके बजाय बलूचिस्तान का मुद्दा रखा था। उस समय भारत ने संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। लेकिन अब दोनों देशों के बीच रिश्तों में नया अध्याय खुलता दिख रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने और रूसी तेल खरीद पर अतिरिक्त शुल्क लगाने के बाद, भारत-चीन रिश्तों में तेजी से बदलाव आया है। दोनों देशों ने आपसी व्यापार बढ़ाने, सीमा पर शांति बनाए रखने और सांस्कृतिक संबंध मजबूत करने पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और चीन दोनों “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति अपनाते हैं और उनके रिश्तों को किसी तीसरे देश के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
चीन भी आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है। शिनजियांग में इस्लामी चरमपंथ की आशंका बनी रहती है और चीन अपने आधिकारिक बयानों में इन्हें आतंकी ताकतें करार देता रहा है। इसके अलावा, चीन के बढ़ते वैश्विक दायरे के चलते उसके नागरिक विदेशों में भी आतंकी खतरों का सामना कर रहे हैं। यही वजह है कि बीजिंग अब आतंकवाद पर अपेक्षाकृत ज्यादा खुलकर सामने आ रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी कल शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ से भी आमने-सामने होंगे। यह मुलाकात पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली होगी।
यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी तीन साल बाद व्यक्तिगत रूप से एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं। 2023 में भारत की मेज़बानी में सम्मेलन ऑनलाइन हुआ था, जबकि 2024 में कज़ाख़स्तान में आयोजित बैठक में मोदी शामिल नहीं हुए थे।