अंतरिक्ष में वर्चस्व की होड़ अब नए मोड़ पर पहुँच चुकी है। अमेरिका ने चाँद पर स्थायी मानव बस्ती के लिए ऊर्जा का इंतज़ाम करने की दिशा में बड़ी घोषणा की है। अब वह वर्ष 2030 तक चाँद की सतह पर 100 किलोवॉट क्षमता वाला परमाणु रिएक्टर लगाने की तैयारी कर रहा है।
नासा के अंतरिम प्रशासक शॉन डफी ने हाल ही में निर्देश जारी कर बताया कि अमेरिका को तेज़ी से कदम बढ़ाने होंगे, क्योंकि चीन और रूस मिलकर 2030 के मध्य तक चाँद पर परमाणु रिएक्टर लगाने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने साफ कहा, “हम चाँद पर चीन के साथ रेस में हैं। अगर हमें वहाँ बेस बनाना है तो ऊर्जा का स्थायी साधन चाहिए।”
दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र को अमेरिका और चीन दोनों ही सबसे उपयुक्त मानते हैं। यहाँ बर्फ़ की उपलब्धता है, जो पानी और ईंधन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। साथ ही, कुछ ऊँची चोटियों पर लगभग निरंतर सूरज की रोशनी मिलती है, जो ऊर्जा स्रोत के लिए आदर्श है।
1967 की ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ के अनुसार कोई भी देश चाँद या अन्य खगोलीय पिंडों पर दावा नहीं कर सकता। हाँ, परमाणु हथियारों की तैनाती वर्जित है, लेकिन शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु रिएक्टर लगाने पर प्रतिबंध नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनौती रिएक्टर की “तैनाती और संचालन” को लेकर है। अगर देश सुरक्षा के नाम पर अपने-अपने ‘सेफ़ ज़ोन’ घोषित करने लगें, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से क्षेत्रीय दावे में बदल सकता है, जो संधि की भावना के विपरीत होगा।
विशेषज्ञ एडवर्ड ओबार्ड के अनुसार, चाँद पर लंबी अवधि तक मानव को बनाए रखने के लिए परमाणु ऊर्जा सबसे प्रभावी साधन है। चाँद पर 14 दिन लगातार अंधेरा रहता है, ऐसे में केवल सौर ऊर्जा पर्याप्त नहीं होगी। परमाणु रिएक्टर न केवल बिजली बल्कि गर्मी भी देगा, जो जीवन के लिए आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “जो देश सबसे बड़ा परमाणु रिएक्टर लेकर जाएगा, वही सबसे बड़ा बेस बना पाएगा और सबसे लंबे समय तक टिक पाएगा।”
अमेरिका का यह कदम साफ दिखाता है कि अंतरिक्ष की अगली दौड़ केवल चाँद पर झंडा गाड़ने तक सीमित नहीं, बल्कि वहाँ स्थायी मानव बस्ती बसाने की ओर बढ़ रही है। अब सवाल यह है कि इस रेस में सबसे पहले कौन पहुँचेगा और क्या यह प्रतियोगिता आने वाले समय में अंतरिक्ष कानूनों और वैश्विक राजनीति को नई दिशा देगी।