वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद देशभर में बहस छिड़ गई है। जहां मुस्लिम समाज के एक वर्ग ने इसे सकारात्मक कदम बताया, वहीं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसे वक्फ के लिए "हार" करार दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को दिए अपने आदेश में वक्फ संशोधन अधिनियम की कुछ विवादित धाराओं पर रोक लगाई। इनमें वह प्रावधान भी शामिल है जिसके अनुसार केवल पिछले पांच वर्षों से इस्लाम का पालन करने वाला व्यक्ति ही वक्फ को संपत्ति दान कर सकता था। हालांकि, अदालत ने पूरे कानून पर स्थगन देने से इनकार कर दिया और कहा कि संवैधानिकता पर संदेह केवल दुर्लभ मामलों में ही स्वीकार किया जाएगा।
न्यायालय ने जिलाधिकारियों को वक्फ संपत्तियों पर अधिकार देने वाली शक्ति को असंवैधानिक मानते हुए रोक लगाई। साथ ही वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या भी सीमित करने का निर्देश दिया।
NDTV से बातचीत में असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “यह कहना गलत है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश वक्फ की जीत है। अगर कोई 120 पेज का जजमेंट पढ़े बिना बयान दे तो यह भ्रम पैदा करता है। हमारे वकील निजाम पाशा का मानना है कि इस आदेश से वक्फ बोर्ड को भारी नुकसान होगा। अदालत ने पूरे कानून पर स्टे नहीं दिया, बल्कि सरकार को नया कानून बनाने का रास्ता खोल दिया है। अब भाजपा ऐसा कानून बनाएगी जिसमें वक्फ संपत्ति पर नियंत्रण और कठिन हो जाएगा।”
उन्होंने कहा कि इस आदेश से वक्फ संपत्तियों को बचाना, विकसित करना और अवैध कब्जों से छुड़ाना और मुश्किल हो जाएगा। ओवैसी ने यह भी आरोप लगाया कि “बीजेपी इस आदेश का इस्तेमाल पूरे देश में वक्फ व्यवस्था को कमजोर करने और सामाजिक तनाव फैलाने के लिए करेगी।”
ओवैसी ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) का हवाला देते हुए कहा कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 140 वक्फ संपत्तियों को एएसआई अपने नियंत्रण में लेना चाहती है। उन्होंने चेतावनी दी कि “कल को संभल की मस्जिद भी एएसआई अपने कब्जे में ले लेगी।”
उन्होंने तर्क दिया कि कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों का सर्वे और रिपोर्ट बनाने का अधिकार देना उचित नहीं है, क्योंकि कलेक्टर सरकार का अधिकारी होता है और उसी की नीति के अनुसार काम करेगा।
ओवैसी ने लक्षद्वीप के सांसद हमदुल्ला सईद का उदाहरण देते हुए कहा कि नए कानून के तहत वे अपनी संपत्ति वक्फ को नहीं दे सकते। उन्होंने कहा, “यह सीधे-सीधे धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। क्या ऐसा प्रावधान किसी दूसरे धर्म के लिए बनाया गया है? अगर नहीं, तो केवल मुसलमानों पर यह प्रतिबंध क्यों?”
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निराशा जताई। उनका कहना है कि अदालत का अंतरिम फैसला वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और विकास की दिशा में सही नहीं है।