यहूदी-विरोध जांच आयोग के प्रमुख पर विवाद, फ्रायडनबर्ग ने पीएम के फैसले को बताया ‘अकल्पनीय’

यहूदी-विरोध जांच आयोग के प्रमुख पर विवाद, फ्रायडनबर्ग ने पीएम के फैसले को बताया ‘अकल्पनीय’

कैनबरा:
ऑस्ट्रेलिया में यहूदी-विरोध (एंटी-सेमिटिज़्म) की बढ़ती घटनाओं की जांच के लिए प्रस्तावित रॉयल कमीशन के नेतृत्व को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। देश के पूर्व कोषाध्यक्ष Josh Frydenberg ने प्रधानमंत्री द्वारा Virginia Bell को आयोग का प्रमुख नियुक्त किए जाने के प्रस्ताव की तीखी आलोचना की है। उन्होंने इस फैसले को “अकल्पनीय” बताते हुए कहा कि इससे यहूदी समुदाय के बीच विश्वास की कमी और गहरी हो सकती है।

फ्रायडनबर्ग का कहना है कि यहूदी-विरोध जैसे संवेदनशील और गंभीर विषय पर गठित रॉयल कमीशन को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है, जिस पर प्रभावित समुदाय को पूर्ण और निर्विवाद भरोसा हो। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आयोग के प्रमुख को लेकर ही संदेह बना रहा, तो जांच की निष्पक्षता और उसके निष्कर्षों पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता है।

पूर्व कोषाध्यक्ष ने कहा, “यह केवल कानूनी योग्यता का सवाल नहीं है, बल्कि नैतिक विश्वसनीयता और सामुदायिक विश्वास का भी मामला है। यहूदी समुदाय को यह महसूस होना चाहिए कि उनकी चिंताओं को पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ सुना जा रहा है।”

हाल के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में यहूदी-विरोधी घटनाओं—जैसे धार्मिक स्थलों पर हमले, नफरत भरे पोस्टर और सोशल मीडिया पर घृणास्पद प्रचार—में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने व्यापक जांच के लिए रॉयल कमीशन गठित करने का प्रस्ताव रखा है, ताकि यहूदी-विरोध के कारणों, इसके फैलाव और इसे रोकने के उपायों की पड़ताल की जा सके।

हालांकि, फ्रायडनबर्ग और यहूदी समुदाय के कुछ नेताओं का मानना है कि High Court of Australia की पूर्व न्यायाधीश वर्जीनिया बेल की नियुक्ति पर सर्वसम्मति नहीं है। उनका तर्क है कि ऐसे आयोग की सफलता केवल कानूनी प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता पर भी निर्भर करती है।

दूसरी ओर, सरकार का पक्ष है कि प्रस्तावित रॉयल कमीशन स्वतंत्र, निष्पक्ष और तथ्य-आधारित जांच करेगा। प्रधानमंत्री Anthony Albanese के कार्यालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आयोग का उद्देश्य किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि यहूदी-विरोध जैसी प्रवृत्तियों को जड़ से समाप्त करने के लिए ठोस सिफारिशें तैयार करना है।

इस मुद्दे ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष जहां आयोग के नेतृत्व पर पुनर्विचार की मांग कर रहा है, वहीं यहूदी समुदाय के कई प्रतिनिधि चाहते हैं कि सरकार ऐसा समाधान निकाले जिससे जांच प्रक्रिया पर किसी भी तरह का अविश्वास न रहे।

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सरकार पर दबाव और बढ़ सकता है, क्योंकि यह मामला केवल प्रशासनिक निर्णय का नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय एकता से भी जुड़ा हुआ है।