शहरों के पार्कों, खेल मैदानों और बच्चों के खेल स्थलों में तेजी से फैल रही कृत्रिम घास (सिंथेटिक टर्फ) और रबर क्रम्ब अब एक गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट का रूप लेती जा रही है। पहले इसे कम रखरखाव, हरियाली और आधुनिक सुविधाओं का प्रतीक माना गया, लेकिन हालिया अध्ययनों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनियों ने इसके खतरनाक पहलुओं को उजागर किया है।
सेहत पर सीधा असर
कृत्रिम घास में इस्तेमाल होने वाला रबर क्रम्ब अक्सर पुराने टायरों से बनाया जाता है। इनमें हानिकारक रसायन, पीएफएएस (पर- और पॉलीफ्लुओरोएल्काइल पदार्थ) और भारी धातुएं पाई जा सकती हैं। गर्म मौसम में यह घास अत्यधिक तापमान तक गर्म हो जाती है, जिससे खिलाड़ियों और बच्चों को हीट स्ट्रोक, त्वचा में जलन और सांस संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, खेलने के दौरान छोटे-छोटे माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव
सिंथेटिक टर्फ प्राकृतिक घास का विकल्प तो है, लेकिन यह न तो मिट्टी को सांस लेने देती है और न ही वर्षा जल के प्राकृतिक रिसाव में मदद करती है। इससे शहरी इलाकों में जलभराव और हीट आइलैंड प्रभाव बढ़ता है। समय के साथ यह घास टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाती है, जो मिट्टी, नदियों और समुद्रों में पहुंचकर जैव विविधता के लिए खतरा बनती है।
जलवायु अनुकूलन में बाधा
जलवायु परिवर्तन के दौर में शहरों को अधिक हरियाली, ठंडक और प्राकृतिक जल प्रबंधन की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक घास इन उद्देश्यों के विपरीत काम करती है। प्राकृतिक पेड़-पौधे और घास जहां कार्बन अवशोषण और तापमान नियंत्रण में सहायक होते हैं, वहीं सिंथेटिक टर्फ गर्मी को बढ़ाती है और कार्बन फुटप्रिंट में इजाफा करती है।
विकल्प और समाधान
पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्थानीय प्रशासन को कृत्रिम घास के अंधाधुंध उपयोग पर पुनर्विचार करना चाहिए। प्राकृतिक घास, देशी पौधों, छायादार पेड़ों और टिकाऊ लैंडस्केपिंग समाधानों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जहां खेल मैदानों में कृत्रिम सतह अनिवार्य हो, वहां सुरक्षित और कम-हानिकारक सामग्री के उपयोग के सख्त मानक लागू किए जाने चाहिए।
निष्कर्ष
शहरों की सुंदरता और सुविधा के नाम पर अपनाई गई प्लास्टिक घास अब एक छुपा हुआ खतरा बन चुकी है। समय रहते यदि इसके दुष्परिणामों को नहीं समझा गया और वैकल्पिक, प्रकृति-आधारित समाधानों की ओर कदम नहीं बढ़ाए गए, तो यह समस्या आने वाले वर्षों में और गंभीर रूप ले सकती है।