नई दिल्ली, 24 अगस्त 2025।
आईएनडीआईए गठबंधन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने से छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के आदिवासी समुदायों में असंतोष बढ़ गया है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह निर्णय उन जख्मों को कुरेदता है, जो सालों पहले सलवा जुडूम आंदोलन के खत्म होने के बाद भी पूरी तरह भर नहीं पाए।
सलवा जुडूम आंदोलन की शुरुआत वर्ष 2005 में माओवादियों की जबरन भर्ती और हिंसा के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों ने की थी। बाद में छत्तीसगढ़ की तत्कालीन रमन सिंह सरकार ने इस आंदोलन को समर्थन दिया। कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा इसके प्रमुख समर्थकों में से थे, जिनकी बाद में माओवादियों ने हत्या कर दी।
हालांकि आंदोलन के चलते बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें सामने आईं। विस्थापन, हिंसा और निर्दोष ग्रामीणों पर अत्याचार की घटनाओं ने इसे विवादास्पद बना दिया। मानवाधिकार संगठनों ने इस पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जुलाई 2011 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी भी शामिल थे, ने सलवा जुडूम को असंवैधानिक करार दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार नागरिकों को हथियारबंद कर किसी सशस्त्र आंदोलन में शामिल नहीं कर सकती। इस फैसले के बाद सलवा जुडूम पर रोक लग गई और राज्य सरकार को सुरक्षा बलों की तैनाती का जिम्मा खुद संभालना पड़ा।
अब जब रेड्डी को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया है, आदिवासी संगठनों का मानना है कि कांग्रेस और आईएनडीआईए गठबंधन ने बस्तर के लोगों के दर्द को नजरअंदाज किया है। उनका कहना है कि सलवा जुडूम में शामिल हजारों आदिवासी विस्थापित हुए, कई परिवार तबाह हो गए, और अब उसी फैसले के लिए जिम्मेदार जज को इतने बड़े संवैधानिक पद पर बैठाने का कदम “अन्यायपूर्ण” है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला विपक्षी गठबंधन की रणनीति का हिस्सा है, लेकिन बस्तर क्षेत्र में इसका असर उल्टा पड़ सकता है। जहां एक ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता इस फैसले को सकारात्मक दृष्टि से देख रहे हैं, वहीं आदिवासी समाज में गहरी नाराज़गी साफ झलक रही है।
👉 यह मामला न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक रूप से भी बेहद संवेदनशील है। रेड्डी की उम्मीदवारी से यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में सलवा जुडूम और उसके परिणाम फिर से राष्ट्रीय बहस का केंद्र बनने वाले हैं।