मेलबर्न की डेम फिलिस फ्रॉस्ट सेंटर (Dame Phyllis Frost Centre) से एक महिला कैदी की डायरी सामने आई है, जिसमें जेल के अंदर हो रहे गंभीर और चौंकाने वाले हालात का खुलासा हुआ है। डायरी में किए गए दावों के अनुसार, जेल में बंदियों को अत्यधिक लॉकडाउन, दूषित पानी, और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है, जिससे आत्महत्या के प्रयासों में भारी वृद्धि हुई है।
कैदी एशली चैपमैन, जो हाल ही में चार साल की सजा काटने के बाद मई में जेल से बाहर आई हैं, ने बताया कि उन्हें कई बार 23 से 24 घंटे तक बिना किसी मानवीय संपर्क के अकेले सीलन भरी कोठरी में बंद रखा गया। दिन की एकमात्र "छुट" उन्हें 20 मिनट की हवा खाने की अनुमति के रूप में मिलती थी — या एक खाली लाउंज रूम में, जहाँ टीवी भी काम नहीं करता।
चैपमैन ने दावा किया कि जेल के पानी में इतनी गंदगी है कि सिंक और शॉवर का फर्श हरा हो गया है। जब वह पानी को सेल के अंदर ग्लास केतली में उबालती थीं, तो केतली की दीवारें काली हो जाती थीं।
उन्होंने कहा, “केतली के अंदर देखना भी नामुमकिन हो जाता था।”
चैपमैन का वजन 80 किलो से घटकर 50 किलो रह गया क्योंकि भोजन में दी जा रही चीजें उनकी एलर्जी को नज़रअंदाज़ करती थीं। कई बार उन्हें डिनर में सिर्फ सीरियल या कुछ भी नहीं मिलता।
चैपमैन ने बताया कि लगातार लॉकडाउन की वजह से कैदियों में मानसिक दबाव तेजी से बढ़ रहा है। जेल में 'कोड ब्लैक' (Code Black) — जो कि एक मेडिकल इमरजेंसी है — लगभग रोज़ाना घोषित किया जाता है। यह आत्महत्या के प्रयासों या गहरे मानसिक तनाव के कारण होता है।
उनका कहना है, “सेल से बाहर निकलते ही वापस अंदर भेज दिया जाता था। बिना वजह, बिना जवाब के। ये मानसिक टॉर्चर है।”
चैपमैन अब भी जेल के अंदर तीन कैदियों से नियमित रूप से संपर्क में रहती हैं और उनका दावा है कि अंदर हालात अब भी वैसे ही हैं — या शायद और बदतर।
इन आरोपों के प्रकाश में आने के बाद मानवाधिकार समूहों और जेल सुधार एजेंसियों ने राज्य सरकार से तत्काल जांच की मांग की है। विक्टोरियन करेक्शनल सर्विसेज की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
यह मामला जेलों में बुनियादी मानवीय अधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मुद्दा उठाता है, जो न सिर्फ ऑस्ट्रेलिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है।