नई दिल्ली। बिहार में चल रहे वोटर लिस्ट संशोधन (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम आदेश पारित किया। कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि मतदाता सूची सुधार के लिए मांगे जाने वाले 11 दस्तावेजों में आधार कार्ड को भी वैध प्रमाण के रूप में शामिल किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य निर्वाचन अधिकारी को सभी राजनीतिक दलों को यह आदेश तत्काल उपलब्ध कराना होगा। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन 65 लाख लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किए गए हैं, उनकी सूची अब सभी पार्टियों के बूथ लेवल एजेंट (BLA) को दी जाए। इन एजेंटों की जिम्मेदारी होगी कि वे इस सूची की जांच करें और जरूरत पड़ने पर दावा और आपत्ति दर्ज कराएं।
कोर्ट ने 14 अगस्त के अपने आदेश को दोहराते हुए कहा कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या सुधार करवाने के लिए नागरिकों को कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। वे ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं और किसी तरह की शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य नहीं होगी।
कोर्ट ने राजनीतिक दलों की भूमिका पर नाराजगी जाहिर की। अदालत ने कहा कि बड़ी संख्या में BLA होने के बावजूद बहुत कम आपत्तियां दर्ज की गईं, जबकि सक्रिय भूमिका से हालात बेहतर हो सकते थे। सुप्रीम कोर्ट ने सभी 12 राजनीतिक दलों को निर्देश दिया है कि वे इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करें और अदालत में स्टेटस रिपोर्ट जमा करें।
चुनाव आयोग की ओर से वकील राकेश द्विवेदी ने अदालत को बताया कि हटाए गए 65 लाख नामों में से 22 लाख मृत पाए गए और करीब 8 लाख नाम डुप्लिकेट थे। वहीं, याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर ने आरोप लगाया कि आयोग जमीन पर काम करने से बच रहा है और लोगों को परेशान कर रहा है।
भूषण ने यह भी कहा कि प्रमुख विपक्षी दल आरजेडी ने आधे निर्वाचन क्षेत्रों में ही BLA तैनात किए हैं, जिससे लोगों की समस्याएं और बढ़ गई हैं।
बिहार SIR की समय सीमा बढ़ाने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने अभी खारिज कर दिया। हालांकि अदालत ने कहा कि यदि बड़ी संख्या में आपत्तियां आती हैं तो समय सीमा बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है।