सुप्रीम कोर्ट में बंगाल सरकार से सख्त सवाल

सुप्रीम कोर्ट में बंगाल सरकार से सख्त सवाल

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार से एक के बाद एक कई अहम सवाल पूछे। यह याचिका मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्तियां उठाई गई हैं।

1.36 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने की आशंका

सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री की ओर से अदालत को बताया गया कि SIR की मौजूदा प्रक्रिया के तहत राज्य में करीब 1.36 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का खतरा है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रक्रिया सामान्य प्रशासनिक सुधार से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।

मुख्यमंत्री ने आशंका जताई कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम तकनीकी और सिस्टमैटिक त्रुटियों के आधार पर हटाए जा सकते हैं। इनमें उपनाम (सरनेम) की वर्तनी में मामूली अंतर, शादी के बाद महिलाओं के पते या नाम में बदलाव, दस्तावेजों में हल्का-सा असंगत विवरण जैसी स्थितियां शामिल हैं, जो आम जीवन की वास्तविकताओं का हिस्सा हैं।

सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि SIR से जुड़ी प्रक्रिया में अधिकारियों के नाम भेजने में देरी क्यों हुई। अदालत ने इसे एक गंभीर चूक मानते हुए कहा कि ऐसी प्रक्रियाओं में समयबद्धता और पारदर्शिता बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी तरह के संदेह की गुंजाइश न रहे।

इसके अलावा अदालत ने राज्य में 8,300 माइक्रो-ऑब्जर्वरों की तैनाती पर भी सवाल खड़े किए। कोर्ट ने जानना चाहा कि इतनी बड़ी संख्या में पर्यवेक्षकों की आवश्यकता किस आधार पर तय की गई और उनकी भूमिका व अधिकारों की स्पष्ट रूपरेखा क्या है।

लोकतंत्र और मताधिकार का मुद्दा

ममता बनर्जी की ओर से दलील दी गई कि यदि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई, तो इसका सीधा असर लोकतांत्रिक ढांचे और नागरिकों के मताधिकार पर पड़ेगा। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं, प्रवासी श्रमिकों और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के मतदाताओं को लेकर चिंता जताई, जिनके दस्तावेजों में बदलाव या विसंगतियां आम हैं।

अदालत का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटाना कोई साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है और इसमें किसी भी तरह की जल्दबाजी, मनमानी या लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने राज्य सरकार से पूरे मामले पर विस्तृत और तथ्यात्मक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

आगे की सुनवाई

कोर्ट ने संकेत दिए कि अगली सुनवाई में SIR की संवैधानिक वैधता, इसकी प्रक्रिया, और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा। इस मामले को आगामी चुनावों के मद्देनजर बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसका असर सीधे चुनावी प्रक्रिया और जनप्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है।