मुंबई, 29 जून 2025 — महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में प्रस्तावित तीन-भाषा नीति (Three Language Policy) को लेकर उठ रहे विरोध के बीच बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने इस नीति के कार्यान्वयन पर फिलहाल रोक लगा दी है और एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है जो इस नीति के भविष्य को लेकर समीक्षा करेगी।
तीन-भाषा नीति के तहत सभी स्कूलों में मराठी, अंग्रेज़ी और एक अन्य भाषा — जिसमें अक्सर हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में प्रस्तावित किया जाता है — को अनिवार्य करने की योजना थी। लेकिन विपक्षी दलों, क्षेत्रीय संगठनों और भाषा-आधारित समूहों ने इस नीति को लेकर कड़ा विरोध जताया। उनका आरोप है कि इस नीति के ज़रिए राज्य में हिंदी 'थोपी' जा रही है, जिससे मराठी भाषियों की सांस्कृतिक पहचान पर आंच आ सकती है।
भाषा नीति पर मचे इस राजनीतिक और सामाजिक घमासान के बीच राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी भी भाषा को थोपने का उसका कोई इरादा नहीं है। सरकार का कहना है कि वह सभी भाषाओं का सम्मान करती है और निर्णय संवाद और सहमति के आधार पर लिए जाएंगे।
नई समिति विभिन्न पक्षों — शिक्षाविदों, भाषा विशेषज्ञों, स्कूल संगठनों और सामाजिक प्रतिनिधियों — से बातचीत कर रिपोर्ट तैयार करेगी और उसके आधार पर सरकार आगे का फैसला लेगी।
इस मुद्दे ने एक बार फिर भारत के बहुभाषी समाज में भाषाई संतुलन की संवेदनशीलता को उजागर किया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि महाराष्ट्र सरकार इस नाजुक मुद्दे पर कैसे संतुलन साधती है।