पुणे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के तबादलों में कार्यपालिका के कथित हस्तक्षेप पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार के खिलाफ दिए गए फैसलों के कारण जजों का तबादला किया जाता है, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता दोनों को गहरा आघात पहुंचेगा।
पुणे स्थित आईएलएस लॉ कॉलेज में एक व्याख्यान के दौरान जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि क्या किसी न्यायाधीश को केवल इसलिए दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जाना उचित है, क्योंकि उसके आदेश सरकार को “असुविधाजनक” लगते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रवृत्ति न्यायिक स्वतंत्रता के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।
जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों की प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र होनी चाहिए और इसमें कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। तबादलों का इस्तेमाल जजों को दंडित करने के औजार के रूप में नहीं किया जा सकता।
उन्होंने न्यायपालिका की आंतरिक व्यवस्था, विशेष रूप से कॉलेजियम प्रणाली, पर भी परोक्ष सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि कॉलेजियम अपने प्रस्तावों में केंद्र सरकार के अनुरोधों को दर्ज करता है, तो यह एक स्वतंत्र संवैधानिक प्रक्रिया में बाहरी दखल को दर्शाता है, जो व्यवस्था की मूल भावना को कमजोर करता है।
हालांकि जस्टिस भुइयां ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी टिप्पणी अक्टूबर 2025 में हुए उस घटनाक्रम से जुड़ी मानी जा रही है, जब कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन का तबादला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट कर दिया था।
अपने संबोधन के अंत में जस्टिस भुइयां ने न्यायाधीशों से बिना भय और पक्षपात के कार्य करने की अपील की। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश की पहली निष्ठा संविधान के प्रति होती है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है और इसकी रक्षा करना प्रत्येक न्यायाधीश का संवैधानिक दायित्व है।