सिडनी:
क्या शिष्टाचार (Chivalry) अब बीते ज़माने की बात हो गई है? क्या पुरुष अब वो व्यवहार नहीं करते जो एक समय सभ्यता और सम्मान की निशानी माना जाता था? यही सवाल इन दिनों फिर से चर्चा में आ गया है, जब एक महिला ने एक ऑस्ट्रेलियाई बस में अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि एक सूट-बूट पहने आदमी ने सीट के लिए उन्हें लगभग धक्का दे दिया।
उसने लिखा, "वो शख्स अपने मज़ेदार मोज़ों में खुद को दिलचस्प समझता था लेकिन असल में 8 बजे सुबह की भीड़ में सीट के लिए धक्का-मुक्की करना बेहद असभ्य था।"
मध्यकालीन युग में "चिवलरी" शब्द योद्धाओं के आदर्श आचरण को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता था, लेकिन आज के संदर्भ में यह महिलाओं के प्रति सम्मान, विनम्रता और मदद के भाव जैसे दरवाज़ा खोलना, सीट देना, पहले जाने देना जैसे व्यवहारों से जोड़ा जाता है।
लेकिन क्या यह शिष्टाचार अब केवल किताबों तक सीमित रह गया है?
News.com.au ने सिडनी की सड़कों पर लोगों से सीधे सवाल किया – “क्या शिष्टाचार मर चुका है?”
परिणाम दिलचस्प रहे –
अधिकतर महिलाएं मानती हैं कि शिष्टाचार अब बहुत कम देखने को मिलता है।
पुरुषों का मानना है कि शिष्टाचार अब भी ज़िंदा है, लेकिन शायद उसकी परिभाषा बदल गई है।
एक युवती ने कहा, “मुझे लगता है शिष्टाचार लगभग खत्म हो गया है। पुरुषों का रवैया अब पहले जैसा नहीं रहा।”
वहीं एक अन्य ने कहा, “शायद यह अब दरवाज़ा खोलने जैसा नहीं, बल्कि स्पॉटिफाई पर प्लेलिस्ट बनाकर देने जैसा हो गया है।”
एक युवा पुरुष ने कहा, “यह अब भी मौजूद है, और होना भी चाहिए, लेकिन अब यह वैसा नहीं रहा जैसा हमारे माता-पिता के समय था।”
लेखिका का कहना है कि आज महिलाएं समान अधिकार और वेतन की मांग कर रही हैं, लेकिन इसके साथ ही पुराने जमाने वाला शिष्टाचार कहीं पीछे छूटता जा रहा है।
उन्होंने चुटकी ली, “हमें पुरुषों से दरवाज़ा न खोलने की आदत तो जल्दी लग गई, लेकिन बराबर वेतन अभी भी सपना है। ऑस्ट्रेलिया में आज भी 12.1% का जेंडर वेतन अंतर बना हुआ है।”
शिष्टाचार खत्म हुआ है या उसने रूप बदला है — यह बहस अभी जारी है। लेकिन एक बात साफ है — महिलाएं चाहती हैं कि बराबरी के अधिकार के साथ साथ सम्मान और संवेदना भी बनी रहे।
शिष्टाचार का अर्थ बदल गया है — लेकिन ज़रूरत आज भी उतनी ही है।